
छत्तीसगढ़ की धरती प्राकृतिक सौंदर्य, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक धरोहरों से समृद्ध है। इन्हीं अनमोल धरोहरों में शामिल है मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के जनकपुर क्षेत्र के समीप स्थित घाघरा मंदिर। यह प्राचीन मंदिर अपनी अद्भुत निर्माण शैली और रहस्यमयी अस्तित्व के कारण वर्षों से लोगों की जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है। बिना किसी गारा, चूना या सीमेंट के, केवल पत्थरों को आपस में संतुलित (इंटरपिनिंग/इंटरलॉकिंग) कर निर्मित यह मंदिर भारतीय स्थापत्य कला और प्राचीन इंजीनियरिंग कौशल का अद्वितीय उदाहरण है।
’पत्थरों के संतुलन पर टिकी है सदियों पुरानी संरचना’
जिला मुख्यालय मनेंद्रगढ़ से लगभग 130 किलोमीटर दूर स्थित घाघरा मंदिर को देखकर पहली नज़र में ही आश्चर्य होता है। सदियों पुरानी यह संरचना समय, मौसम और कई प्राकृतिक आपदाओं का सामना करते हुए आज भी मजबूती से खड़ी है। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके निर्माण में भारी-भरकम पत्थरों को इस प्रकार संतुलित किया गया है कि उन्हें जोड़ने के लिए किसी अन्य बाहरी सामग्री की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। यही खूबी इसे देश की अनूठी पुरातात्विक धरोहरों की श्रेणी में खड़ा करती है।




