
प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने राजस्व सेवा के अधिकारियों को राष्ट्र की वित्तीय शक्ति का संरक्षक बताया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देश भर में विकास कार्य तभी संभव हैं, जब करों के माध्यम से राजस्व प्राप्त हो। उन्होंने कहा कि जहाँ एक ओर यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि कर की चोरी न हो, वहीं अधिकारियों को यह भी देखना चाहिए कि करदाताओं को किसी भी प्रकार की अनावश्यक असुविधा का सामना न करना पड़े। उपराष्ट्रपति ने आगे कहा कि अवैध आय की पहचान की जानी चाहिए, जबकि ईमानदारी और कानूनी तरीके से की गई कमाई की सराहना होनी चाहिए।
उन्होंने उल्लेख किया कि कर प्रशासन और भुगतान में प्रौद्योगिकी के बढ़ते उपयोग जैसे सुधारों के बावजूद, कुछ लोग अभी भी करों की चोरी के लिए सिस्टम में हेरफेर करने का प्रयास कर सकते हैं। उपराष्ट्रपति ने कहा कि ऐसे मामलों का पता लगाना और यह सुनिश्चित करना कि देय कर का भुगतान किया जाए, कर अधिकारियों का कर्तव्य है।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत तेजी से प्रगति कर रहा है, जहाँ बड़े पैमाने पर संपत्ति का सृजन हो रहा है, बुनियादी ढांचा मजबूत हो रहा है और ग्रामीण एवं शहरी दोनों क्षेत्रों में विकास आगे बढ़ रहा है। उन्होंने उल्लेख किया कि आर्थिक विकास के साथ जैसे-जैसे राजस्व बढ़ता है, राजस्व अधिकारियों की भूमिका और जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। ईमानदार करदाताओं को सच्चे देशभक्त बताते हुए उन्होंने कहा कि उनके साथ हमेशा सम्मानपूर्वक व्यवहार किया जाना चाहिए।




