
दिल्ली। पिछले एक दशक में भारत की पहचान सिर्फ एक बड़े डिजिटल बाजार की नहीं रही, बल्कि वह दुनिया के सामने एक उदीयमान वैश्विक टेक-पावरबनकर उभरा है। पहले जहाँ भारत को केवल इंटरनेट प्लेटफॉर्म्स और डिजिटल सेवाओं के एक विशाल उपभोक्ता के रूप में देखा जाता था, वहीं आज हमारा देश अपने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई), स्वदेशी नवाचारों और दमदार स्टार्टअप इकोसिस्टम के दम पर पूरी दुनिया में तकनीक की दिशा तय कर रहा है। सरकार के निरंतर निवेश ने देश की तकनीकी क्षमता को न केवल विस्तार दिया है, बल्कि दुनिया में भारत की विश्वसनीयता को भी मजबूत किया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), सेमीकंडक्टर्स, क्वांटम टेक्नोलॉजी, सुपरकंप्यूटिंग, क्लाउड कंप्यूटिंग और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में चलाए जा रहे मिशन-मोड अभियानों ने देश में इनोवेशन की एक नई लहर पैदा कर दी है। आज हमारा भरोसेमंद डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, समावेशी डिजिटल गवर्नेंस और बढ़ती ग्लोबल पार्टनरशिप भारत को दुनिया के सामने एक विश्वसनीय तकनीकी साझेदार के रूप में स्थापित कर रहे हैं। ये तमाम उपलब्धियां ‘विकसित भारत 2047’ के सपने की मजबूत नींव रख रही हैं और वैश्विक पटल पर भारत की भूमिका को और बुलंद कर रही हैं।
दिल्ली। पिछले एक दशक में भारत की पहचान सिर्फ एक बड़े डिजिटल बाजार की नहीं रही, बल्कि वह दुनिया के सामने एक उदीयमान वैश्विक टेक-पावरबनकर उभरा है। पहले जहाँ भारत को केवल इंटरनेट प्लेटफॉर्म्स और डिजिटल सेवाओं के एक विशाल उपभोक्ता के रूप में देखा जाता था, वहीं आज हमारा देश अपने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई), स्वदेशी नवाचारों और दमदार स्टार्टअप इकोसिस्टम के दम पर पूरी दुनिया में तकनीक की दिशा तय कर रहा है। सरकार के निरंतर निवेश ने देश की तकनीकी क्षमता को न केवल विस्तार दिया है, बल्कि दुनिया में भारत की विश्वसनीयता को भी मजबूत किया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), सेमीकंडक्टर्स, क्वांटम टेक्नोलॉजी, सुपरकंप्यूटिंग, क्लाउड कंप्यूटिंग और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में चलाए जा रहे मिशन-मोड अभियानों ने देश में इनोवेशन की एक नई लहर पैदा कर दी है। आज हमारा भरोसेमंद डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, समावेशी डिजिटल गवर्नेंस और बढ़ती ग्लोबल पार्टनरशिप भारत को दुनिया के सामने एक विश्वसनीय तकनीकी साझेदार के रूप में स्थापित कर रहे हैं। ये तमाम उपलब्धियां ‘विकसित भारत 2047’ के सपने की मजबूत नींव रख रही हैं और वैश्विक पटल पर भारत की भूमिका को और बुलंद कर रही हैं।
भारत के इस बदलाव को राष्ट्रीय क्षमता विकास में किए गए बड़े निवेशों से जबरदस्त ताकत मिली। इसके लिए बड़े पैमाने पर स्किलिंग प्रोग्राम, एडवांस्ड रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टार्टअप सपोर्ट और इंडस्ट्री-एकेडेमिया सहयोग को बढ़ावा दिया गया। इसके साथ ही, देश भर में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, रिसर्च हब्स, सेमीकंडक्टर प्रयोगशालाओं और उभरती प्रौद्योगिकियों के संस्थानों की स्थापना की गई। इन सभी प्रयासों ने मिलकर देश के उभरते हुए क्षेत्रों में एक भविष्य के लिए तैयार कार्यबल को विकसित करने के अभूतपूर्व अवसर पैदा किए।
देश की इस बढ़ती क्षमता और व्यापक विस्तार ने वैश्विक स्तर पर भारत की तकनीकी विश्वसनीयता को और भी मजबूत किया है। आज भारत ने एक भरोसेमंद डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई), सुरक्षित डिजिटल गवर्नेंस सिस्टम और मजबूत अंतर्राष्ट्रीय तकनीकी साझेदारियां खड़ी कर ली हैं। भारत ने पूरी दुनिया के सामने यह साबित करके दिखाया है कि कैसे समावेशन, सुलभता और किफायत को सुनिश्चित करते हुए इतनी बड़ी आबादी के स्तर पर तकनीक का सफल उपयोग किया जा सकता है। आज भारत न केवल वैश्विक तकनीकों को अपना रहा है, बल्कि एक भरोसेमंद, समावेशी और मानव-केंद्रित तकनीकी विकास को लेकर वैश्विक विमर्श और बहसों को नया आकार भी दे रहा है।
डिजिटल इंडिया प्रोग्राम: उभरती हुई तकनीकी क्षमताओं का आधारस्तंभ
वर्ष 2015 में शुरू किए गए ‘डिजिटल इंडिया प्रोग्राम’ ने देश भर में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करके भारत के उभरते टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम की नींव रखी। ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क के तेजी से विस्तार ने हाई-स्पीड कनेक्टिविटी के लिए मजबूत आधार तैयार किया। ऑप्टिकल फाइबर कवरेज 2019 में 19.35 लाख रूट किलोमीटर से बढ़कर 2025 में 42.36 लाख रूट किलोमीटर हो गई है। इस विस्तार ने शहरी और ग्रामीण भारत में इंटरनेट की पहुंच, नेटवर्क की विश्वसनीयता और डिजिटल कनेक्टिविटी में सुधार किया है। भारत ने विश्व के सबसे तेज 5G रोलआउट में से एक को भी हासिल किया है, जिसकी सेवाएं 99.9 प्रतिशत जिलों तक पहुँच चुकी हैं। इस उन्नत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर ने पूरे देश में इंटरनेट के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया। इंटरनेट कनेक्शन की संख्या 2014 में 25.15 करोड़ से बढ़कर 2026 में 102.86 करोड़ हो गई है। इंटरनेट के ज्यादा इस्तेमाल ने ब्रॉडबैंड पहुंच का और अधिक विस्तार किया है, जिससे ब्रॉडबैंड कनेक्शन 2014 के 6.1 करोड़ से बढ़कर दिसंबर 2025 में 99.56 करोड़ हो गए हैं।
इस डिजिटल विस्तार ने नागरिकों, स्टार्टअप्स, व्यवसायों, शैक्षणिक संस्थानों, स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों और सरकारी सेवाओं को डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया है। तेज और अधिक विश्वसनीय कनेक्टिविटी ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग, ब्लॉकचेन, फिनटेक और अन्य डेटा-संचालित प्रौद्योगिकियों के विकास को भी सक्षम बनाया है।
किफायती मूल्यों पर उपलब्ध इंटरनेट ने लोगों के बीच प्रौद्योगिकी को अपनाने की गति को और तेज कर दिया है। औसत मासिक डेटा खपत 2014 में 61.66 एमबी से बढ़कर दिसंबर 2025 में 24.01 जीबी हो गई है। इसी अवधि के दौरान, डेटा की लागत ₹269 प्रति जीबी से घटकर ₹8-10 प्रति जीबी रह गई है।. इंटरनेट की कम लागत ने टेलीमेडिसिन, ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स और ई-गवर्नेंस सेवाओं तक पहुंच का विस्तार किया है। इस व्यापक डिजिटल उपयोग ने नवाचार, स्टार्टअप्स और डिजिटल एंटरप्रेन्योरशिप के लिए एक मजबूत यूजर इकोसिस्टम का निर्माण किया है।
पिछले 12 वर्षों में, ‘डिजिटल इंडिया’ प्रोग्राम भारत के डिजिटल रूपांतरण की रीढ़ बनकर उभरा है। इस प्रोग्राम ने न केवल डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को सुदृढ़ किया और कनेक्टिविटी का विस्तार किया, बल्कि सभी क्षेत्रों में टेक्नोलॉजी को अपनाने की प्रक्रिया भी तेज की है। इन प्रयासों ने भारत को एक वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी डिजिटल अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करने के साथ-साथ भविष्य की तैयारी और उभरती प्रौद्योगिकियों में राष्ट्रीय क्षमताओं को विस्तार देने के लिए एक सशक्त आधार तैयार किया है।
भविष्य की तैयारी हेतु क्षमताओं का विकास
भारत एआई, सेमीकंडक्टर्स, क्वांटम टेक्नोलॉजी और सुपरकंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में निरंतर निवेश के माध्यम से भविष्य के लिए तैयार एक तकनीकी इकोसिस्टम का निर्माण कर रहा है। मिशन-आधारित कार्यक्रम विभिन्न क्षेत्रों में स्वदेशी नवाचार, अनुसंधान क्षमताओं और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत कर रहे हैं। ये पहल एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग और रणनीतिक प्रौद्योगिकी विकास को भी प्रोत्साहित कर रही हैं, साथ ही उभरती प्रौद्योगिकियों के लिए भारत को एक विश्वसनीय और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी केंद्र के रूप में मजबूत बना रही हैं।
हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग के लिए सुपरकंप्यूटर
सुपरकंप्यूटर अत्यंत शक्तिशाली कंप्यूटर होते हैं, जिन्हें प्रति सेकंड अरबों गणनाएं करने के लिए डिजाइन किया गया है। इनका उपयोग उन जटिल समस्याओं को हल करने के लिए किया जाता है जिन्हें सामान्य कंप्यूटर कुशलतापूर्वक नहीं संभाल सकते। आज, मौसम पूर्वानुमान, क्लाइमेट मॉडलिंग, एआई और दवाएं खोजने आदि के लिए ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जैसे-जैसे डेटा की मात्रा और कंप्यूटिंग की मांग बढ़ रही है, सुपरकंप्यूटर वैज्ञानिक नवाचार को गति देने और तीव्र, साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने में मदद करते हैं। ये तकनीकी नेतृत्व और आर्थिक प्रतिस्पर्धा के लिए एक अनिवार्य इंफ़्रास्ट्रक्चर ढांचा बन गए हैं। वर्ष 2015 में ₹4,500 करोड़ के परिव्यय के साथ शुरू किए गए नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन (एनएसएम) के अंतर्गत, भारत ने देश के अग्रणी संस्थानों में 47 पेटाफ्लॉप्स की संयुक्त कंप्यूटिंग क्षमता वाले 38 सुपरकंप्यूटर तैनात किए हैं। एक बड़ी उपलब्धि स्वदेशी ‘परम रुद्र’ सीरीज का विकास है, जिसे भारतीय-डिजाइन वाले हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के साथ तैयार किया गया है। यह हाई-परफ़ॉर्मेंस कंप्यूटिंग (एचपीसी) में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें
भारत का सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम
सेमीकंडक्टर आधुनिक डिजिटल और उभरती हुई प्रौद्योगिकियों की नींव हैं। ये कम्युनिकेशन, मोबिलिटी, डिफेंस, मैन्युफैक्चरिंग आदि में इस्तेमाल होने वाले डिवाइस को चलाते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी), 5जी और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी प्रौद्योगिकियां काफी हद तक सेमीकंडक्टर क्षमता पर ही निर्भर हैं। टेक्नोलॉजिकल आत्मनिर्भरता को मजबूत करने के उद्देश्य से, भारत सरकार ने दिसंबर 2021 में ₹76,000 करोड़ के परिव्यय के साथ ‘सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम’ शुरू किया। इस कार्यक्रम ने सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग, डिस्प्ले फैब्रिकेशन, चिप डिजाइन, पैकेजिंग, टेस्टिंग, टैलेंट डेवलपमेंट और रिसर्च सहयोग को प्रोत्साहित किया। ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ से प्रेरित यह पहल भारत को ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स वैल्यू चेन का हिस्सा बनाने के लिए थी। इस गति को आगे बढ़ाते हुए, केंद्रीय बजट 2026–27 में ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (आईएसएम) 2.0’ की घोषणा की गई, जिसमें वित्त वर्ष 2026–27 के लिए ₹1,000 करोड़ का प्रारंभिक प्रावधान रखा गया है। आईएसएम 2.0 मुख्य रूप से इक्विपमेंट, मटीरियल, स्वदेशी बौद्धिक संपदा (आईपी), मजबूत सप्लाई चेन, रिसर्च, ट्रेनिंग और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं पर केंद्रित है, जो भारत को सेमीकंडक्टर के एक वैश्विक प्रतिस्पर्धी केंद्र के रूप में स्थापित कर रहा है।
क्या आप जानते हैं?
वर्ष 2021 में शुरू की गई डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव (डीएलआई) स्कीम, भारत के फैबलेस सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को विकसित करने में एक प्रमुख भूमिका निभा रही है। ‘सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम’ के तहत कार्यान्वित यह योजना स्टार्टअप्स, एमएसएमई और शैक्षणिक संस्थानों को फाइनेंशियल इंसेंटिव और एडवांस्ड डिजाइन इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से सहायता प्रदान करती है। यह योजना सेमीकंडक्टर डिजाइन के संपूर्ण लाइफसाइकल को कवर करती है। स्वदेशी चिप डिजाइन क्षमताओं को सुदृढ़ करके, यह योजना आयात पर निर्भरता को कम करती है और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में घरेलू मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देती है। मार्च 2026 तक, डीएलआई योजना के तहत 24 कंपनियों को वित्तीय सहायता प्राप्त हुई है और 105 आवेदकों को ईडीए टूल्स (डिजाइन टूल्स) का समर्थन मिला है। साथ ही, 16 टेप-आउट्स से सात चिप्स का निर्माण किया गया है, जिनमें एडवांस्ड 12 नैनोमीटर (12 nm) डिजाइन भी शामिल हैं। जून 2026 तक की स्थिति के अनुसार, ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ (आईएसएम) के तहत लगभग ₹1.64 लाख करोड़ की लागत वाली 12 परियोजनाओं को स्वीकृति दी जा चुकी है। इनमें एक सेमीकंडक्टर फैब, दो कंपाउंड सेमीकंडक्टर फैब और नौ पैकेजिंग यूनिट शामिल हैं। यह पहल देश में सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग के स्वदेशी इकोसिस्टम का निर्माण कर रही है और आयात पर निर्भरता को कम कर रही है। अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें
क्वांटम भविष्य का सूत्रपात: एक नई तकनीकी युग की ओर
क्वांटम टेक्नोलॉजी इक्कीसवीं सदी के उन निर्णायक क्षेत्रों के रूप में उभर रही हैं जो भविष्य की दिशा तय करेंगे। ये टेक्नोलॉजी क्वांटम मैकेनिक्स या फिजिक्स के उन नियमों पर आधारित हैं, जो सब-एटॉमिक पार्टिकल्स (परमाणु से भी छोटे कणों) पर लागू होते हैं। यह क्षेत्र संभावनाओं के सिद्धांतों पर आधारित है, जहाँ तत्व एक साथ कई अवस्थाओं में विद्यमान रह सकते हैं। इस तकनीक पर आधारित टूल्स अत्यंत शक्तिशाली कंप्यूटिंग क्षमता से लैस हैं और सामान्य उपकरणों की तुलना में कहीं अधिक संवेदनशील और सुरक्षित हैं। इनमें स्वास्थ्य सेवा, वित्त, लॉजिस्टिक्स और क्लाइमेट मॉडलिंग जैसे क्षेत्रों में कई अवस्थाओं में परिवर्तन लाने की क्षमता है। साथ ही, ये बेहद सुरक्षित कम्युनिकेशन और एडवांस्ड डेटा प्रोसेसिंग को संभव बनाते हैं। जैसे-जैसे राष्ट्र इन क्षमताओं को हासिल करने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, क्वांटम प्रौद्योगिकियाँ आर्थिक विकास, तकनीकी नेतृत्व और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कारक बनती जा रही हैं।




