
रायपुर। आंजनेय विश्वविद्यालय अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए राष्ट्र निर्माण में उत्कृष्ट योगदान देने वाले ख्यातिलब्ध व्यक्तित्वों को सम्मानित करने की गौरवशाली परंपरा का निर्वाह करता है। इसी उद्देश्य से विश्वविद्यालय समाज, संस्कृति, शिक्षा, साहित्य, विज्ञान एवं लोककल्याण के क्षेत्रों में विशिष्ट कार्य करने वाले पद्मश्री सम्मानित विभूतियों को अपने शैक्षणिक परिवार से जोड़ने का प्रयास करता है। यह पहल केवल सम्मान का अवसर नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को जीवन मूल्यों, सामाजिक सरोकारों, नेतृत्व, सेवा और राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा प्रदान करने का सशक्त माध्यम है। ऐसे व्यक्तित्वों के अनुभव और विचार विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास तथा विकसित भारत के निर्माण में उनकी भूमिका को सुदृढ़ बनाने में सहायक सिद्ध होते हैं। इसी क्रम में प्रो. प्रकाश चंद्र सूद भारत के वरिष्ठतम सक्रिय नाभिकीय वैज्ञानिकों में से एक हैं, जिन्होंने विज्ञान, अनुसंधान और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सात दशकों से अधिक समय तक उल्लेखनीय योगदान दिया है। जिन्हें पद्मश्री सम्मान से वर्ष 2023 में भारत सरकार द्वारा “साहित्य एवं शिक्षा (Literature & Education)” क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रदान किया गया था। 1 अक्टूबर 1928 को जन्मे प्रो. सूद ने पंजाब विश्वविद्यालय से एम.एससी. तथा फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी (अमेरिका) से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। नाभिकीय भौतिकी के क्षेत्र में उनका कार्य उन्हें देश के अग्रणी वैज्ञानिकों की श्रेणी में स्थापित करता है। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में शिक्षक, शोधकर्ता, प्रशासक और संस्थान निर्माता के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 2015 में उन्हें “भारत के वरिष्ठतम सक्रिय नाभिकीय वैज्ञानिक” के रूप में सम्मानित किया गया। अपने लंबे वैज्ञानिक जीवन में उन्होंने देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों एवं शोध संस्थानों के साथ कार्य करते हुए वैज्ञानिक संस्कृति के विकास को नई दिशा प्रदान की। आज भी वे युवा शोधार्थियों और वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं।
विज्ञान एवं शिक्षा के क्षेत्र में प्रो. सूद का योगदान
प्रो. प्रकाश चंद्र सूद ने भारत में नाभिकीय भौतिकी अनुसंधान को सशक्त आधार प्रदान करने में अग्रणी भूमिका निभाई। बीएचयू में उन्होंने नाभिकीय संरचना भौतिकी का महत्वपूर्ण शोध कार्यक्रम प्रारंभ किया तथा देश की पहली विश्वविद्यालय-आधारित नाभिकीय अनुसंधान प्रयोगशाला की स्थापना में योगदान दिया। उन्होंने 1978 में बीएचयू में आधुनिक कंप्यूटर केंद्र की स्थापना कर उच्च शिक्षा में कंप्यूटर संस्कृति के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। नियमित पाठ्यक्रमों में कंप्यूटर विज्ञान को शामिल करने की पहल भी उनके दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम थी। उनके निर्देशन में अनेक शोधार्थियों ने उच्च स्तरीय अनुसंधान किया और देश-विदेश के प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी पहचान बनाई। 320 से अधिक शोध पत्रों के प्रकाशन, अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग, विभिन्न देशों में व्याख्यानों तथा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय अकादमिक संस्थाओं में सक्रिय सहभागिता के माध्यम से उन्होंने भारतीय विज्ञान को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित किया। उनका जीवन ज्ञान, शोध और राष्ट्र निर्माण के प्रति समर्पण का उत्कृष्ट उदाहरण है।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करते हुए कुलपति डॉ टी रामाराव, डीन अकादमिक डॉ हरीश शर्मा, प्रोफेसर सी. रमेश सहित अन्य शामिल रहे।




