
• पद्मश्री सम्मानित समाजसेवियों ने साझा किए बस्तर सेवा के चार दशकों के अनुभव
रायपुर। आंजनेय विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित विशेष संवाद कार्यक्रम “समर्पण से सम्मान तक : बस्तर की धरती पर सेवा, संवेदना और सामाजिक परिवर्तन की प्रेरक यात्रा” में पद्मश्री सम्मानित समाजसेवी पद्मश्री सुनीता गोडबोले एवं डॉ. रामचंद्र गोडबोले ने बस्तर के आदिवासी अंचलों में चार दशकों से अधिक समय तक किए गए अपने सेवा कार्यों के अनुभव विद्यार्थियों एवं प्राध्यापकों के साथ साझा किए। कार्यक्रम का संचालन पैनल डिस्कशन के रूप में डॉ राहुल तिवारी विभागाध्यक्ष पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग ने किया, जिसमें दोनों अतिथियों ने अपने जीवन के अनेक प्रेरक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए बताया कि समाज सेवा केवल एक कार्य नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि सुविधाओं से परिपूर्ण जीवन छोड़कर बस्तर के दूरस्थ क्षेत्रों में कार्य करने का निर्णय कठिन अवश्य था, किन्तु वहीं उन्हें जीवन का वास्तविक अर्थ और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अनुभव हुआ। चर्चा के दौरान उन्होंने आदिवासी समाज की जीवनशैली, स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियों, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कार्य करने के अनुभव तथा सामाजिक विश्वास अर्जित करने की लंबी प्रक्रिया पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बस्तर ने उन्हें धैर्य, संवेदनशीलता, सेवा और मानवीय मूल्यों का वास्तविक पाठ पढ़ाया। पद्मश्री सुनीता गोडबोले ने कहा कि किसी भी समाज में परिवर्तन लाने के लिए बड़े संसाधनों की अपेक्षा दृढ़ संकल्प, निरंतरता और संवेदनशील दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे समाज सेवा की शुरुआत छोटे-छोटे कार्यों से करें और अपने ज्ञान एवं ऊर्जा का उपयोग समाज के वंचित वर्गों के उत्थान में करें। वहीं चर्चा के दौरान डॉ. रामचंद्र जी ने जनजातीय क्षेत्रों में प्रचलित विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं एवं बीमारियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि दूरस्थ वनांचलों में आज भी कुपोषण, एनीमिया, मलेरिया, सिकल सेल एनीमिया, क्षय रोग (टीबी), मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ तथा स्वच्छ पेयजल एवं पोषण के अभाव से उत्पन्न अनेक बीमारियाँ गंभीर चुनौती बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि इन समस्याओं का समाधान केवल चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराने से संभव नहीं है, बल्कि जनजागरूकता, संतुलित पोषण, स्वच्छता, समय पर उपचार तथा स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी भी उतनी ही आवश्यक है। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि जनजातीय समाज के बीच विश्वास स्थापित कर स्वास्थ्य सेवाओं को घर-घर तक पहुँचाना ही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि रही है।
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने भी अतिथियों से अनेक प्रश्न पूछे। उन्होंने यह जानने का प्रयास किया कि चार दशकों तक निरंतर सेवा करने की प्रेरणा उन्हें कहाँ से मिली, कठिन परिस्थितियों में उन्होंने स्वयं को कैसे सकारात्मक बनाए रखा तथा पद्मश्री सम्मान प्राप्त होने के बाद उनकी जिम्मेदारियाँ किस प्रकार बढ़ी हैं। अतिथियों ने अपने अनुभवों के माध्यम से सभी प्रश्नों के उत्तर देते हुए सेवा, समर्पण एवं मानवीय मूल्यों को जीवन का आधार बनाने का संदेश दिया।
कार्यक्रम के अंत में विश्वविद्यालय परिवार की ओर से दोनों पद्मश्री सम्मानित अतिथियों का शॉल, श्रीफल एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मान किया गया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने कहा कि ऐसे प्रेरक व्यक्तित्वों के अनुभव विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण एवं सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होंगे।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के महानिदेशक डॉ बी सी जैन, कुलपति डॉ टी रामाराव, निदेशक डॉ जयेंद्र नारंग, कुलसचिव डॉ रुपाली चौधरी, निदेशक अकादमिक डॉ संध्या वर्मा सहित अधिष्ठाता, विभिन्न संकायों के विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।




